Saturday, September 5, 2026

क्यों कहलाए शीश के दानी बाबा खाटू श्याम, जानें पूरी पौराणिक कथा

by Neha

जानें बाबा श्याम के बर्बरीक से खाटू श्याम बनने की पूरी पौराणिक कथा, शीश दान, श्रीकृष्ण के वरदान और श्याम कुंड का महत्व।

राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में बाबा श्याम के भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि बाबा खाटू श्याम कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण के नाम से पूजे जाने वाले देवता हैं। उन्हें ‘हारे का सहारा’ और ‘शीश के दानी’ जैसे नामों से भी जाना जाता है।

हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु खाटू श्याम जी के दर्शन करने पहुंचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाबा श्याम को यह नाम कैसे मिला और उनका खाटू नगरी से क्या संबंध है? आइए जानते हैं बाबा श्याम की पूरी पौराणिक कथा।

कौन थे बाबा खाटू श्याम?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, बाबा श्याम का मूल नाम बर्बरीक था। उन्हें महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। कथा के अनुसार बर्बरीक, भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र थे।

बर्बरीक बचपन से ही बेहद शक्तिशाली और देवी के परम भक्त थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें तीन दिव्य बाण प्रदान किए। इन तीनों बाणों के कारण उन्हें तीन बाणधारी के रूप में भी जाना जाने लगा।

बर्बरीक ने क्यों लिया था हारने वाले पक्ष का साथ?

महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले बर्बरीक ने युद्ध में शामिल होने की इच्छा अपनी माता हिडिंबा के सामने रखी। माता ने उन्हें एक महत्वपूर्ण वचन देने के लिए कहा।

कथा के अनुसार, हिडिंबा ने बर्बरीक से कहा कि वह युद्ध में हमेशा उस पक्ष की ओर से लड़ेंगे, जो कमजोर यानी हार की स्थिति में होगा। बर्बरीक ने अपनी माता की बात मान ली और युद्ध के लिए निकल पड़े। बर्बरीक के पास मौजूद दिव्य बाणों की शक्ति को देखते हुए यह स्थिति महाभारत के युद्ध का परिणाम बदल सकती थी।

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श्रीकृष्ण ने क्यों मांगा बर्बरीक का शीश?

पौराणिक कथा के मुताबिक, भगवान श्रीकृष्ण बर्बरीक की शक्ति और उनके संकल्प से परिचित थे। उन्हें पता था कि अगर बर्बरीक युद्ध में उतरते हैं तो वह कमजोर पक्ष का साथ देंगे और बदलती परिस्थितियों के साथ उनका पक्ष भी बदल सकता है।

ऐसे में श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धारण कर बर्बरीक की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने बर्बरीक से दान में उनका शीश मांग लिया। बर्बरीक ने दान का वचन निभाते हुए बिना किसी संकोच के अपना शीश श्रीकृष्ण को अर्पित कर दिया। इसी कारण उन्हें ‘शीश के दानी’ कहा जाता है।

श्रीकृष्ण ने दिया कलियुग में पूजे जाने का वरदान

कथा के अनुसार, बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा जताई। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से वह पूरे युद्ध को देख सके।

युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया कि कलियुग में उनकी पूजा उनके ही नाम से नहीं, बल्कि श्याम नाम से होगी। इसी मान्यता के कारण बर्बरीक को खाटू श्याम बाबा के रूप में पूजा जाता है। भक्त उन्हें संकट में साथ देने वाला ‘हारे का सहारा’ भी मानते हैं।

खाटू में कैसे पहुंचा बाबा श्याम का शीश?

लोकमान्यता के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के शीश को एक नदी में प्रवाहित कर दिया था। कहा जाता है कि बहते हुए उनका शीश वर्तमान राजस्थान के खाटू क्षेत्र में पहुंचा। उस समय यह क्षेत्र खाटूवांग नगरी के नाम से जाना जाता था। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में इसी स्थान को बाबा श्याम की वर्तमान पूजा स्थली से जोड़ा जाता है।

श्याम कुंड में मिला था बाबा का शीश

खाटू श्याम से जुड़ी स्थानीय मान्यता के अनुसार, एक स्थान पर एक गाय रोजाना अपने आप दूध गिराती थी। इस असामान्य घटना ने ग्रामीणों का ध्यान आकर्षित किया।

जब उस स्थान पर खुदाई की गई तो वहां से एक शीश मिलने की बात कही जाती है। मान्यता है कि यही बर्बरीक का शीश था। यह शीश फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन मिला था। इसी वजह से फाल्गुन शुक्ल एकादशी को बाबा श्याम के जन्मोत्सव से जोड़कर देखा जाता है।

खाटू श्याम मंदिर और श्याम कुंड का महत्व

स्थानीय मान्यता के अनुसार, खुदाई में मिले शीश को चौहान वंश की नर्मदा देवी को सौंपा गया। इसके बाद शीश की स्थापना मंदिर के गर्भगृह में की गई।

जिस स्थान से शीश मिलने की मान्यता है, वहां बाद में श्याम कुंड का निर्माण हुआ। आज श्याम कुंड भी खाटू श्याम धाम आने वाले श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है।

क्यों कहते हैं बाबा श्याम को ‘हारे का सहारा’?

बाबा श्याम के भक्तों के बीच यह विश्वास प्रचलित है कि वह मुश्किल समय में अपने भक्तों का साथ देते हैं। बर्बरीक द्वारा कमजोर पक्ष का साथ देने की प्रतिज्ञा और श्रीकृष्ण के वरदान की कथा के कारण उन्हें ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है। इसी आस्था के चलते देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु खाटू श्याम जी के दरबार में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं।

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