सोनम वांगचुक जी और अभिजीत दीपक के नेतृत्व में युवा अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं: गोपाल इटालिया
विसावदर के विधायक गोपाल इटालिया ने तानाशाही और लोकतंत्र के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि, देश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए हमारे पूर्वजों और स्वतंत्रता सेनानियों ने वर्षों तक संघर्ष किया है। लोकतंत्र की मूल भावना यह है कि देश का सामान्य नागरिक अपनी सरकार से सवाल पूछ सके। लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार पूरी तरह तानाशाही रवैया अपना रही है। आज देश में NEET सहित अनेक भर्ती परीक्षाओं के पेपर लगातार लीक हो रहे हैं। युवाओं का बिल्कुल वाजिब सवाल है कि इतने सारे पेपर लीक हो रहे हैं तो आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? एक बच्चा दसवीं कक्षा से लेकर मेडिकल में प्रवेश पाने तक दिन-रात मेहनत करता है और उसका पूरा परिवार उसके लिए संघर्ष करता है, लेकिन घोटालेबाजों के कारण पेपर लीक होने से छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। पेपर लीक के कारण अब तक देश के 21 निर्दोष बच्चों ने आत्महत्या कर ली है, तो क्या इसका कोई जिम्मेदार नहीं है? सोनम वांगचुक जी और अभिजीत दीपक के नेतृत्व में देश के युवा अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। जब ये छात्र दिल्ली के जंतर-मंतर से अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्वक संसद की ओर ज्ञापन देने (संसद कूच) गए, तब पुलिस ने उन पर पेलेट गन चलाई, कीलों वाले डंडों और लाठियों से अमानवीय अत्याचार किया। हमारे ही देश के बच्चों को हमारे ही देश की सरकार धोखा दे, यही तो तानाशाही है। चुनाव में वोट देने वाला व्यक्ति अगर सरकार से सवाल पूछे, तो वह ‘देशद्रोही’ या ‘देशविरोधी’ कैसे हो जाता है? यह भाजपा सरकार की कायरता और तानाशाही को दर्शाता है।
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‘आप’ विधायक गोपाल इटालिया ने आगे जोर देते हुए कहा कि, तानाशाही किसी एक दिन में नहीं आती, बल्कि धीरे-धीरे समाज में अपने पैर पसारती है। यदि आज हम पेपर लीक जैसे गंभीर घोटालों, बदहाल सड़कों, जर्जर सरकारी अस्पतालों, बिगड़ी हुई शिक्षा व्यवस्था या पुलिस थानों में शिकायत दर्ज न होने जैसे मुद्दों पर आवाज नहीं उठाएंगे, तो आने वाले समय में हम सभी गुलामी की ओर धकेल दिए जाएंगे। तानाशाही के खिलाफ लड़ना देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। यह लड़ाई किसी एक राजनीतिक दल, प्रधानमंत्री या भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि देश की संवैधानिक व्यवस्था और लोकतंत्र को जीवित रखने की लड़ाई है। किसी भी देश में नेता या राजनीतिक दल स्थायी नहीं होते, लेकिन देश और उसकी व्यवस्था शाश्वत रहती है। डरकर क्यों जीना? इसलिए बिना डरे देश के हर नागरिक, बुजुर्ग और युवा को आगे आना होगा। उन्होंने पूरे गुजरात की जनता से अपील की कि इस सत्य और न्याय की लड़ाई में अन्याय का शिकार हुए छात्रों के लिए यदि आप कुछ नहीं कर सकते, तो कम से कम व्हाट्सएप पर स्टेटस और फेसबुक पर पोस्ट डालकर उनकी आवाज बुलंद करें और खुलकर उनका समर्थन करें। डरकर क्यों जीना?