रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे ने कॉग्निटिव वॉरफेयर के जरिए सेना और समाज को अविश्वास दिलाने की रणनीति को गंभीर खतरा बताया।
भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में “कॉग्निटिव वॉरफेयर” का मुद्दा उठाया है। उनका कहना था कि मानसिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लोगों को संस्थानों के प्रति विश्वासहीन बनाना है। इसके बाद उन्होंने सेना के खिलाफ अविश्वास पैदा होने की चिंता भी जताई। याद रखें कि कॉग्निटिव वॉरफेयर (Cognitive Warfare) एक तरह का युद्ध है जो इंसानी दिमाग और सोच को लक्ष्य बनाता है। इसमें शत्रु देश या संगठन लोगों की भावनाओं, भावनाओं और निर्णयों को प्रभावित करने की कोशिश करता है। यह टिप्पणी डीपी पांडे ने लेफ्टिनेंट कर्नल सुशील सिंह श्योराण (रिटायर्ड) की एक पोस्ट को पुनः प्रकाशित करते हुए की। श्योराण ने अपनी पोस्ट में आईसा की अध्यक्ष नेहा बोरा पर कई टिप्पणियां कीं।
‘दुश्मन को हमला करने की आवश्यकता नहीं है (रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे)
डीपी पांडे ने लिखा कि कॉग्निटिव वॉरफेयर में दुश्मन पहले लोगों में न्यायपालिका, पुलिस, शिक्षा और समाज जैसे संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करता है। सशस्त्र बलों के संस्थानों पर इसके बाद निशाना साधा जाता है। उन्हें लगता है कि जब अविश्वास गहरा जाता है, दुश्मन को सीधे हमला करने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि समाज खुद ही हार मान सकता है।
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कम्युनिस्ट विचारधारा और स्थिति पर प्रश्न
साथ ही, पांडे ने अपने लेख में कम्युनिस्ट विचारधारा पर सवाल उठाया। उन्होंने लिखा कि कुछ लोगों को मंच पर नहीं बैठना चाहिए, न ही पद, अधिकार या नेतृत्व हासिल करना चाहिए, क्योंकि उनकी दुनिया की कल्पना ऐसी है। उनका अगला सवाल कम्युनिस्ट संगठनों में पदानुक्रम था। उन्हें वृंदा करात का नाम लेकर पूछा कि क्या उन्होंने, उनके पति या उनके वरिष्ठ सहयोगियों ने अपने बंगले छोड़कर अगली पीढ़ी को स्थान दिया है। पांडे ने यह भी पूछा कि क्या वे झुग्गियों, आदिवासी इलाकों या गरीबों के बीच वापस जाकर रह रहे हैं, जिनका वे दावा करते हैं कि वे प्रतिनिधित्व करते हैं। यह विचार उनके पूर्व पोस्ट में व्यक्त किए गए थे।
साथ ही यूरोप और स्पेन का उल्लेख किया
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल ने अपने लेख में स्पेन और यूरोप के कथित तौर पर हो रहे “पतन और गिरावट” का भी उल्लेख किया। कुछ खास वर्गों और समूहों को इसकी वजह बताते हुए उन्हें “बेहद खतरनाक” बताया। पांडे ने कहा कि खासकर वे लोग ज्यादा खतरनाक हैं जो कुछ करते हैं, लेकिन उनके कहे का असली अर्थ अलग है।