ब्लड शुगर कंट्रोल और डायबिटीज के लिए सिर्फ वजन घटाना पर्याप्त नहीं। जानें क्यों फैट लॉस ही असली समाधान है और कैसे पेट व लिवर के फैट को घटाकर इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाई जा सकती है।
जब लोग वेट लॉस या डाइटिंग शुरू करते हैं, तो शुरुआती दिनों में वजन तेजी से घटने लगता है। लेकिन ज्यादातर यह कमी पानी, ग्लाइकोजन और कभी-कभी मसल्स लॉस के कारण होती है। ब्लड शुगर कंट्रोल और डायबिटीज के मामले में सिर्फ वजन घटाना काफी नहीं है। असली सुधार तब होता है जब शरीर में मौजूद फैट, खासकर पेट और लिवर के आसपास जमा विसरल फैट, घटता है।
वेट लॉस और फैट लॉस में अंतर
कई लोग सोचते हैं कि स्केल पर वजन कम होना ही ब्लड शुगर को कंट्रोल करने का संकेत है। लेकिन रिसर्च बताती है कि वजन घटने का मतलब फैट घटना नहीं होता। अगर वजन कम होने के दौरान मसल्स लॉस होता है, तो यह ब्लड शुगर और मेटाबॉलिक हेल्थ पर नेगेटिव असर डाल सकता है। मसल्स ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलने का मुख्य जरिया होती हैं।
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फैट लॉस से कैसे बढ़ती है इंसुलिन सेंसिटिविटी
फैट लॉस का मतलब है शरीर में जमा एक्स्ट्रा फैट, खासकर विसरल फैट, को कम करना। यह फैट इंसुलिन रेजिस्टेंस की मुख्य वजह है। फैट कम होने पर:
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शरीर में सूजन घटती है
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फैटी एसिड्स कम होते हैं
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इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार आता है
एक रिसर्च में पाया गया कि सिर्फ 10% फैट लॉस से इंसुलिन सेंसिटिविटी लगभग 30% तक बढ़ सकती है, चाहे कुल वजन में बड़ा बदलाव न आया हो।
बिना ज्यादा वजन घटाए फैट घटाना
वजन कम किए बिना फैट कम करना संभव है। खासकर रेजिस्टेंस ट्रेनिंग और संतुलित डाइट के जरिए मसल्स बनाए रखते हुए फैट घटाया जा सकता है। इससे मेटाबॉलिक हेल्थ और ब्लड शुगर कंट्रोल बेहतर होता है।
फैट लॉस के असरदार तरीके
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रेजिसटेंस और एरोबिक एक्सरसाइज: मसल्स बनाए रखते हुए फैट बर्न करें।
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प्रोटीन युक्त डाइट: मसल्स लॉस को रोकने के लिए।
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फाइबर, हेल्दी फैट और साबुत अनाज: ब्लड शुगर कंट्रोल के लिए।
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पूरा नींद लें: नींद की कमी इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाती है।
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फास्ट डाइट या एक्सट्रीम डिटॉक्स प्लान से बचें।