यंग डायबिटीज पेशेंट्स में आंखों पर पहला असर, जानें डायबिटिक रेटिनोपैथी और बचाव के तरीके

यंग डायबिटीज पेशेंट्स में आंखों पर पहला असर, जानें डायबिटिक रेटिनोपैथी और बचाव के तरीके

यंग डायबिटीज पेशेंट्स में आंखों पर पहला असर डायबिटिक रेटिनोपैथी से होता है। जानें इसके लक्षण, खतरे और आंखों की सुरक्षा के आसान उपाय।

डायबिटिक रेटिनोपैथी एक ऐसी बीमारी है, जिसमें लगातार बदलते ब्लड शुगर लेवल के कारण आंख के रेटिना की छोटी ब्लड सेल्स कमजोर हो जाती हैं। रेटिना आंख का वह हिस्सा है जो रोशनी को पहचानता है और देखने में मदद करता है। भारत में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है और अब यह समस्या युवाओं में भी देखने को मिल रही है।

ICMR–India Diabetes 2024 के अनुसार, भारत में हर छठा डायबिटीज पेशेंट 40 साल से कम उम्र का है। कम उम्र में डायबिटीज होने पर लंबे समय तक यह बीमारी बनी रहती है, जिससे आंखों सहित अन्य अंगों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

डायबिटिक रेटिनोपैथी क्या है?

डायबिटिक रेटिनोपैथी में लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर रेटिना की ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाता है। शुरुआती स्टेज में यह अक्सर बिना किसी लक्षण के शुरू होती है। जैसे-जैसे ब्लड शुगर बढ़ता है, रेटिना की छोटी ब्लड सेल्स में सूजन या ब्लीडिंग होने लगती है। धीरे-धीरे नई असामान्य सेल्स बनती हैं जो दृष्टि पर असर डालती हैं। यदि समय पर इलाज न किया जाए, तो यह अंधेपन का कारण बन सकती है।

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यंग डायबिटीज पेशेंट्स में खतरा

40 साल से कम उम्र के लगभग 12-15% भारतीय डायबिटीज मरीजों में शुरुआती लक्षण दिखने लगते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार, रेटिना आंख का सबसे संवेदनशील हिस्सा है और डायबिटीज का सबसे पहला असर यहीं पर दिखाई देता है।

बढ़ते खतरे के कारण

आज की आधुनिक लाइफस्टाइल जैसे:

  • प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन

  • लंबा स्क्रीन टाइम

  • तनाव और नींद की कमी

  • हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल

  • स्मोकिंग की आदत

ये सभी रेटिना की ब्लड सेल्स को कमजोर कर देते हैं और डायबिटिक रेटिनोपैथी का खतरा बढ़ाते हैं।

आंखों की सुरक्षा कैसे करें?

  • ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखें।

  • डाइट में फाइबर, हरी सब्जियां, खट्टे फल, मछली, अलसी और अखरोट शामिल करें।

  • रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की जगह साबुत अनाज और मिलेट्स लें।

  • रोजाना 30 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी करें।

  • पर्याप्त पानी पिएं और 7-8 घंटे की नींद लें।

  • साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच करवाएं।

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