Monday, July 20, 2026

जगन्नाथ रथयात्रा 2026: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में क्यों लगाई जाती है सोने की झाड़ू? जानें इस अनोखी परंपरा का धार्मिक महत्व

by Versha
पुरी जगन्नाथ रथयात्रा में गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथ का मार्ग साफ करते हुए।

जगन्नाथ रथयात्रा 2026 में सोने की झाड़ू से मार्ग साफ करने की परंपरा का धार्मिक महत्व जानें। यह रस्म सेवा, समानता और समर्पण का संदेश देती है।

ओडिशा के पुरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ रथयात्रा 2026 केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और आध्यात्मिक मान्यताओं का अद्भुत संगम है। इस भव्य यात्रा में कई ऐसी रस्में निभाई जाती हैं, जो श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती हैं। इन्हीं में से एक खास परंपरा है सोने की झाड़ू से रथ मार्ग की सफाई करना।

जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं। लाखों श्रद्धालु इस पवित्र यात्रा में शामिल होकर रथों की रस्सियां खींचते हैं और भगवान के दर्शन का लाभ प्राप्त करते हैं।

रथयात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज या उनके राजवंश के उत्तराधिकारी एक विशेष धार्मिक रस्म निभाते हैं, जिसे ‘छेरा पहंरा’ कहा जाता है। इस परंपरा के तहत वे सोने के हत्थे वाली झाड़ू से रथ के आगे के मार्ग की सफाई करते हैं।

कौन लगाता है सोने की झाड़ू?

जगन्नाथ रथयात्रा में सोने की झाड़ू लगाने का कार्य पुरी के गजपति महाराज करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के सामने हर व्यक्ति समान है। इसलिए राजा भी भगवान की सेवा में स्वयं को एक सामान्य सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इस परंपरा के बाद वैदिक मंत्रों और भगवान जगन्नाथ के जयघोष के बीच रथयात्रा आगे बढ़ती है। यह रस्म केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा हुआ है।

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सोने की झाड़ू का क्या है धार्मिक महत्व?

सनातन परंपरा में सोने को पवित्रता, दिव्यता और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। भगवान जगन्नाथ की यात्रा के मार्ग को सोने की झाड़ू से साफ करना उनके स्वागत और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

इस परंपरा के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि भगवान की नजर में सभी भक्त समान हैं। चाहे कोई राजा हो या सामान्य व्यक्ति, भगवान के सामने सभी का स्थान बराबर है। गजपति महाराज स्वयं झाड़ू लगाकर विनम्रता और सेवा भाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

सेवा और समर्पण का प्रतीक है यह परंपरा

जगन्नाथ रथयात्रा में निभाई जाने वाली यह परंपरा भक्तों के लिए सेवा, समर्पण और अहंकार त्याग का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस पवित्र रस्म के दर्शन मात्र से भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

कई पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी रथयात्रा का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। यह न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करती है, बल्कि समाज को समानता, विनम्रता और सेवा का संदेश भी देती है।

जगन्नाथ रथयात्रा 2026 में भी लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बनेंगे और भगवान जगन्नाथ के दिव्य दर्शन का लाभ उठाएंगे।

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