संतान सप्तमी के दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। इसलिए पूजा के समय इनकी आरती करना अनिवार्य है। यहां आप सभी आरतियों के लिरिक्स देखेंगे।
आरती का किसी भी व्रत-पूजन में विशिष्ट महत्व माना जाता है। 18 सितंबर को नवजात शिशुओं की सप्तमी है। इसलिए इस दिन पूजा करते समय भी तीन आरतियां करनी चाहिए। माना जाता है कि इन आरतियों के बिना संतान सप्तमी की पूजा पूरी नहीं मानी जाती। इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा होती है। इसलिए पूजा के समय इनकी आरती करना अनिवार्य है। गणेशजी की आरती भी पूजा की शुरुआत में करनी चाहिए क्योंकि हिंदू धर्म में हर पूजा आरती से शुरू की जाती है। अब इन आरतियों का पूरा लिरिक्स आपको बताते हैं।
संतान सप्तमी उत्सव
संतान सप्तमी की पूजा करते समय गणेशजी की आरती सबसे पहले करनी चाहिए। माता पार्वती की आरती इसके बाद की जाती है। अंत में भगवान शिव की आरती करें। कहा जाता है कि आज इन तीनों आरतियों को करने से जीवन सुखमय होता है। संतान भी लंबी आयु की होती है।
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॥ श्री गणेश की आरती ॥
जय श्री गणेश, जय श्री गणेश, जय श्री गणेश देव।
पिता महादेवा और माता जाकी पार्वती
जय श्री गणेश, जय श्री गणेश, जय श्री गणेशदेव।
पिता महादेवा और माता जाकी पार्वती
एक दन्त दयावन्त और चार भुजाधारी है।
माथे पर सोहे तिलक, मूसे की सवारी।
पान चढ़े, फूल चढ़े, मेवा चढ़े।
हार चढ़े, फूल चढ़े और मेवा चढ़े।
लड्डु का भोग लगे, सन्त सेवा करें।
जय श्री गणेश, जय श्री गणेश, जय श्री गणेशदेव।
मां जाकी पार्वती और पिता महादेव
उसने अंधे को आंख दी और कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
सूर श्याम ने शरण ली, सेवा सफल हुई।
पिता महादेवा और माता जाकी पार्वती
शम्भु सुतवारी, दीनन की लाज रखो।
तुम्हारी इच्छा पूरी करो, भगवान बलिहारी।
जय श्री गणेश, जय श्री गणेश, जय श्री गणेशदेव।
पिता महादेवा और माता जाकी पार्वती
॥ श्रीमती पार्वती की आरती
॥ श्री पार्वती माता की आरती ॥
सनातन देवी ब्रह्म शुभ फल प्रदान करती है।
सलाम पार्वती माता
अरिकुल पद्म विनाशिनि जय सेवक त्राता
हरिहर गुण गाता है, जग जीवन जगदम्बा।
सलाम पार्वती माता
सिंह को वाहन, साथा को कुण्डल।
देव वधू गाता तथा नृत्य करता।
सलाम पार्वती माता
सतयुग की स्त्री का नाम सती है, जो बहुत सुंदर है।
जन्मी हेमांचल घर में, सखियन के साथ राता।
सलाम पार्वती माता
शुम्भ विदारे, निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्थायी।
शत भुजा तनु धरि के, चक्र लियो हाथा॥
सलाम पार्वती माता
सृष्टि की जननी शिवसंग रंगराता तुही है।
नन्दी भृंगी ने बीन लेकर पूरे विश्व को प्रसन्न कर दिया।
सलाम पार्वती माता
हम चित को देवता की कृपा से लाते हैं।
गावत दे दे ताली, मन में रंगराता।
सलाम पार्वती माता
श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता।
हमेशा खुश रहते हुए धन प्राप्त करते हैं।
सलाम पार्वती माता
॥ शिव की आरती॥
जय शिव ओंकारा, स्वामी।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव और अर्द्धांगी प्रवाह
जय श्री शिव ओंकारा॥
एकनान चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन, गरूड़ासन, वृषवाहन।
जय श्री शिव ओंकारा॥
दो भुज, चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
जय श्री शिव ओंकारा॥
मुण्डमाला धारी अक्षमाला।
त्रिपुरारी कंसारी धारण कर माला।
जय श्री शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर, पीताम्बर और बाघम्बर।
सनादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
जय श्री शिव ओंकारा॥
कर के मध्य में त्रिशूलधारी कमण्डलु चक्र।
कल्याणकारी दुःखहारी जगपालनकारी॥
जय श्री शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेक
प्रणवाक्षर में ये तीनों एक हैं।
जय श्री शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी और सावित्री पार्वती एक दूसरे का संगा।
शिवलहरी गंगा, पार्वती अर्द्धांगी।
जय श्री शिव ओंकारा॥
देवी पार्वती, शंकर कैलासा।
भस्मी में वासा, भांग धतूर का खाना।
जय श्री शिव ओंकारा॥
गल मुण्डन माला, जटा में गंगा बहत।
शेष नाग लिपटावत, मृगछाला ओढ़त।
जय श्री शिव ओंकारा॥
नन्दी ब्रह्मचारी विश्वनाथ काशी में विराजे गए।
रोज उठकर देखो, महिमा बहुत भारी है।
जय श्री शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित परिणाम प्राप्त होंगे।
जय श्री शिव ओंकारा॥