ज्योतिषीय मान्यताओं में बताया गया है कि चांदी की धातु और इसे पैरों की खास उंगली में पहनने का कारण ग्रहों से हैं। चलिए जानते हैं राहु-केतु और चांदी की बिछिया के बीच क्या संबंध है।
भारतीय महिलाओं का पारंपरिक आभूषण बिछिया है। क्या आपने कभी सोचा है कि बिछिया सिर्फ चांदी की क्यों होती है और दूसरी उंगली पर क्यों पहना जाता है? यह सिर्फ परंपरा नहीं है, बल्कि ज्योतिषीय मान्यताएं भी हैं। अब जानते हैं कि बिछिया को पैर की दूसरी उंगली में ही क्यों पहनना चाहिए और राहु-केतु से चांदी के गहने का क्या खास संबंध बताया गया है।
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चांदी से ग्रहों का संबंध
ज्योतिषियों ने चांदी को चंद्रमा और शुक्र के साथ जोड़ा है। चंद्रमा को मन और मानसिक शांति का कारक माना जाता है, जबकि शुक्र को शादी में सुख और सौंदर्य से संबंधित माना जाता है। यही कारण है कि पैरों में चांदी पहनना सकारात्मक ऊर्जा को बनाए रखने और मानसिक तनाव को कम करने में फायदेमंद है। वहीं, कुछ राशियों के लिए चांदी की अंगूठी वरदान है।
राहु-केतु का क्या संबंध है?
पुरानी ज्योतिष में, ग्रह शरीर के प्रत्येक हिस्से से जुड़े हैं। केतु पैरों और शरीर के निचले हिस्से पर प्रभाव डालता है, जबकि राहु भ्रम और अचानक आने वाली बाधाओं से जुड़ा हुआ है। ज्योतिषियों का मानना है कि चांदी की शीतल प्रकृति इन ग्रहों के बुरे प्रभावों को कम करने में मदद करती है।
बिछिया को दूसरी ही उंगली में क्यों पहनते हैं?
बिछिया अक्सर पैर के अंगूठे के ठीक पास पहनी जाती है। पुरानी मान्यताओं और एक्यूप्रेशर के विचारों के अनुसार, इस उंगली की नसें शरीर के कुछ महत्वपूर्ण अंगों से जुड़ी हैं। कुछ परंपराओं में चांदी का हल्का दबाव भी शरीर को संतुलित रखने के लिए अच्छा है।
सोने की बिछिया क्यों नहीं दी जाती?
धार्मिक मान्यताओं में पैरों में सोना पहनना वर्जित है। सोना भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे कमर से नीचे धारण करना अनुचित माना जाता है। इसलिए परंपरागत रूप से बिछिया के लिए चांदी ही चुना गया।
टूटते ही बदलें
ज्योतिषियों का मानना है कि बिछिया टूटना या खोना शुभ नहीं है। ऐसे समय में चांदी की बिछिया से पुरानी को बदल दें। दोनों पैरों में बिछिया संतुलित रूप से पहनना परंपरागत मान्यता है।