Thyroid Disorder: भारत में थायरॉयड रोग तेजी से फैल रहा है और लोगों में इसकी जागरूकता अभी भी कम है। थायरॉयड हार्मोन में असंतुलन (Thyroid Hormone Imbalance) का मतलब होता है कि थायरॉयड ग्रंथि पर्याप्त हार्मोन का उत्पादन नहीं कर रही या जरूरत से ज्यादा कर रही है। शुरुआती चरण में यह समस्या अक्सर छुपी रहती है और मरीज को कोई गंभीर लक्षण महसूस नहीं होते।
बॉर्डरलाइन थायरॉयड का क्या मतलब है?
जब ब्लड टेस्ट में TSH का स्तर थोड़ा बढ़ा या कम दिखता है, लेकिन T3 और T4 सामान्य सीमा में हों, तो इसे बॉर्डरलाइन थायरॉयड या सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉयडिज्म कहा जाता है। डॉ. वंदना बूभना के अनुसार, भारत में यह समस्या आम है, लेकिन हल्के लक्षणों के कारण लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। समय के साथ यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
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भारत में थायरॉयड बढ़ने के कारण
पहले भारत आयोडीन की कमी वाला देश था, लेकिन नमक में आयोडीन मिलाने की नीति से स्थिति सुधरी। फिर भी, हाशिमोटो थायरॉयडाइटिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियाँ, बढ़ती उम्र, प्रदूषण, मोटापा और तनाव थायरॉयड असंतुलन में योगदान देते हैं। महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक प्रभावित होती हैं, खासकर प्रेग्नेंसी, डिलीवरी और पेरिमेनोपॉज के समय। गर्भावस्था में नियंत्रित न किए गए थायरॉयड हार्मोन मां और शिशु दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार थायरॉयड के लक्षण स्पष्ट नहीं होते। हल्की थकान, वजन बढ़ना, बाल झड़ना या मूड में बदलाव को लोग सामान्य मान लेते हैं। हालांकि, अगर समय पर जांच और निगरानी न की जाए, तो सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉयडिज्म गंभीर स्थिति में बदल सकता है।
रोकथाम और देखभाल
- डॉक्टर की सलाह पर 6 से 12 हफ्ते बाद दोबारा थायरॉयड जांच कराएं।
- जरूरत पड़ने पर थायरॉयड एंटीबॉडी टेस्ट करवाएं।
- आयोडीन संतुलित मात्रा में लें।
- वजन, मासिक चक्र और हार्मोनल बदलाव पर ध्यान दें।
- हर बॉर्डरलाइन केस में दवा जरूरी नहीं होती; इलाज का निर्णय उम्र, लक्षण और प्रेग्नेंसी स्थिति के आधार पर लिया जाता है।
- समय पर जागरूकता और नियमित जांच थायरॉयड रोग के जोखिम को कम कर सकती है।