चैतर वसावा का आरोप: गुजरात सरकार ने आदिवासी विकास फंड का आधा भी खर्च नहीं किया, पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति में बदलाव से हजारों छात्रों का भविष्य खतरे में।
आम आदमी पार्टी के डेडियापाड़ा के विधायक चैतर वसावा ने बजट में आदिवासी छात्रों के साथ हुए गंभीर अन्याय के मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि गुजरात सरकार द्वारा घोषित बजट का हमने विश्लेषण किया है, और आज मैं उसी पर बात करना चाहता हूं। गुजरात में आदिवासी समाज की 15% आबादी है, अर्थात 1 करोड़ 25 लाख आदिवासी लोग गुजरात में निवास करते हैं। 15 नवंबर को देडियापाड़ा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि वे पांच वर्षों में गुजरात के आदिवासी समाज के लिए दो लाख करोड़ रुपये खर्च करेंगे। फिर भी बजट में आदिवासी समुदाय को 5425 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। मैंने विधानसभा में आदिवासी विकास मंत्री नरेशभाई पटेल से पहले आवंटित राशि की जानकारी मांगी थी। उसके जवाब में मंत्री ने बताया कि वर्ष 2024-25 में 4373 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन केवल 3373 करोड़ रुपये खर्च किए गए, तो शेष 1000 करोड़ कहाँ गए? इसी प्रकार 2025-26 में 5120 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन उसमें से केवल 2410 करोड़ रुपये खर्च किए गए, अर्थात जो राशि निर्धारित की गई थी उसका 50% भी खर्च नहीं किया गया। आज आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण, सिकल सेल, पीने के पानी की समस्या, सिंचाई के पानी का अभाव, कई गांवों में सड़क की कमी, गर्भवती महिलाओं को झोली में उठाकर ले जाने की मजबूरी, आदिवासी क्षेत्रों के अस्पतालों में पर्याप्त स्टाफ की कमी, सीटी स्कैन और सोनोग्राफी जैसी मशीनों का अभाव और एंबुलेंस सुविधाओं की कमी है। युवाओं के लिए रोजगार उपलब्ध नहीं है। आदिवासी समाज और क्षेत्र के लोग सुविधाओं और रोजगार के लिए तरस रहे हैं, लेकिन सरकार आदिवासी विकास के लिए निर्धारित फंड का भी उपयोग नहीं कर रही है। 5000 करोड़ के मुकाबले सरकार को वास्तव में 6000 करोड़ खर्च करने की आवश्यकता थी। आदिवासी लोगों के साथ हो रहे इस अन्याय को हम कभी नहीं भूलेंगे।
also read: AAP नेता इसुदान गढवी ने गुजरात बजट की आलोचना की, कहा…
विधायक चैतर वसावा ने आगे कहा कि दूसरा मुद्दा यह है कि आदिवासी विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें, इसके लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना वर्ष 2010 से लागू थी, जिसमें केंद्र सरकार 75% और राज्य सरकार 25% अनुदान देती थी। इस योजना के तहत आदिवासी विद्यार्थी एएनएम, जीएनएम, डिप्लोमा, डिग्री, एमबीबीएस, बीएससी, एमएससी, फार्मेसी जैसे विभिन्न उच्च पाठ्यक्रमों में अध्ययन कर सकते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि 28-10-2024 को राज्य सरकार ने परिपत्र जारी कर इस योजना में बदलाव करते हुए केवल सरकारी कोटा के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने और मैनेजमेंट तथा वेकेंट कोटा के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति न देने की घोषणा की। सरकार स्वयं सरकारी और मैनेजमेंट दो कोटे निर्धारित करती है, लेकिन अब मैनेजमेंट और वेकेंट कोटा के विद्यार्थियों को सहायता न देने का निर्णय लिया गया है। वर्ष 2024-25 में लगभग 60 हजार विद्यार्थियों ने मैनेजमेंट और वेकेंट कोटा में प्रवेश लिया है, लेकिन सरकार के निर्णय के अनुसार एक भी विद्यार्थी को छात्रवृत्ति नहीं दी जाएगी। इससे हजारों आदिवासी विद्यार्थियों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। उन्होंने कहा कि गरीब परिवार जीएनएम के लिए दो लाख रुपये या एमबीबीएस के लिए पांच लाख रुपये की फीस कैसे भर पाएंगे? इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराने के लिए बिरसा मुंडा भवन और विधानसभा का घेराव किया गया था। सत्र के दौरान विरोध दर्ज कराने पर कुछ विधायकों को निलंबित भी किया गया था।
AAP विधायक चैतर वसावा ने आगे कहा कि डेडियापाड़ा में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए आदिवासी विकास विभाग से ₹41 करोड़ खर्च किए गए, ऐसा सरकार ने बताया। सड़क एवं भवन विभाग ने ₹54 करोड़ खर्च किए, तथा स्वास्थ्य, तालुका पंचायत, डीआरडीए, शिक्षा विभाग, नगरपालिका और कलेक्टर कार्यालय द्वारा भी खर्च किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी बच्चों के पोषण, आंगनवाड़ी, शैक्षणिक और कल्याणकारी योजनाओं की ग्रांट से कार्यक्रम के ब्रांडिंग, होर्डिंग, मोमेंटो, सेटअप, मेहमानों के ठहरने की व्यवस्था और मोबाइल टॉयलेट जैसी व्यवस्थाओं पर खर्च किया गया। यदि सरकार वास्तव में आदिवासी हितैषी होती तो आवंटित बजट का पूरा उपयोग करती और आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त मांग भी लाती। लेकिन आवंटित बजट का आधा भी खर्च न कर सरकार ने आदिवासी हित के प्रति अपनी असंवेदनशीलता दर्शाई है। आदिवासी विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों और पूरे समाज से जागरूक होने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का आह्वान किया गया।