विधानसभा में हुई चर्चा के बारे में आम आदमी पार्टी के विसावदर के विधायक गोपाल इटालिया ने मीडिया के सामने कहा कि आज मैंने सरकार से कुल तीन तारांकित प्रश्न पूछे थे। हालांकि मेरे दो प्रश्न सेलेक्ट नहीं हुए, यानी मंजूर नहीं हुए, जबकि एक प्रश्न मंजूर होने के कारण सरकार की ओर से उसका जवाब मुझे मिला है। मूल मुद्दा यह है कि गुजरात हाईकोर्ट अहमदाबाद में स्थित है और गुजरात राज्य बहुत विशाल है। एक तरफ कच्छ का सरहदी क्षेत्र है, एक तरफ वापी तक गुजरात फैला हुआ है, एक तरफ वाव तक और दूसरी तरफ झालोद तक राज्य विस्तारित है। इसके बावजूद हाईकोर्ट की केवल एक ही प्रिंसिपल बेंच अहमदाबाद में कार्यरत है। मैं स्वयं वकील के रूप में वकालत के व्यवसाय से जुड़ा हुआ हूं, इसलिए मुझे पता है कि हाईकोर्ट की केवल एक ही प्रिंसिपल बेंच होने के कारण राज्य के अलग-अलग जिलों में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों, मामलों से जुड़े पक्षकारों तथा सरकारी अधिकारियों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, वापी या कच्छ के दूरदराज क्षेत्रों से लेकर देवभूमि द्वारका जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से मामलों की तारीख के लिए अहमदाबाद आना पड़ता है। पुलिस, कलेक्टर, शिकायतकर्ता, आरोपी और वकील सभी को अहमदाबाद आना पड़ता है, जिसके कारण रहने, खाने, यात्रा और अन्य खर्चों सहित हजारों रुपयों का खर्च होता है। गोपाल इटालिया ने कहा कि अन्य राज्यों में हाईकोर्ट की एक से अधिक बेंच कार्यरत हैं। महाराष्ट्र में मुंबई मुख्य प्रिंसिपल बेंच है, लेकिन नागपुर और अन्य क्षेत्रों में भी हाईकोर्ट की बेंच हैं। इसी तरह मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी एक से अधिक हाईकोर्ट बेंच कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि गुजरात में भी यदि सूरत और राजकोट में हाईकोर्ट की सर्किट बेंच शुरू की जाए तो सौराष्ट्र क्षेत्र के मामलों की सुनवाई राजकोट में हो सकेगी और दक्षिण गुजरात के मामलों की सुनवाई सूरत में हो सकेगी। जिससे वापी, वलसाड, डांग, तापी, नर्मदा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को अहमदाबाद आने की जरूरत नहीं पड़ेगी और उनका समय तथा खर्च दोनों बच सकेंगे। इस मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रश्न पूछा था, लेकिन उनका यह प्रश्न मंजूर न होने के कारण सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं मिला और इस मुद्दे पर विधानसभा में कोई चर्चा भी नहीं हुई। गोपाल इटालिया ने कहा कि जनता के मंच से वे गुजरात सरकार से अपील करते हैं कि राजकोट और सूरत में हाईकोर्ट की सर्किट बेंच, डबल जजों की बेंच के रूप में शुरू की जाए। ताकि अहमदाबाद स्थित प्रिंसिपल बेंच पर बोझ कम होगा और लोगों को अपने क्षेत्र में या उसके नजदीक ही न्याय की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।
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गोपाल इटालिया ने आगे कहा कि मैंने गुजरात के कोली समाज के लिए एक प्रस्तुति की थी। कोली समाज गुजरात का संख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा समाज है और कोली समाज का आस्था केंद्र संत श्री वेलनाथ बापु हैं। वेलनाथ बापु का जन्मस्थान और उनका ऐतिहासिक धूणा जूनागढ़ जिले के पलासवा गांव में स्थित है। संत श्री वेलनाथ बापु को गुजरातभर के कोली समाज द्वारा बहुत श्रद्धा और आस्था से माना जाता है। लेकिन ऐसे संत वेलनाथ बापु के धूणा का आज तक गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा कोई उचित विकास नहीं किया गया है। वहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधा, यात्रियों को जानकारी मिले ऐसी व्यवस्था, रहने-खाने की सुविधा, पार्किंग, CCTV कैमरा, टॉयलेट-बाथरूम तथा महिलाओं के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इतना विशाल कोली समाज जो वेलनाथ बापु को मानता है, ऐसे वेलनाथ बापु के जन्मस्थान का विकास करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश पलासवा गांव में स्थित वेलनाथ बापु के धूणा का अभी तक विकास नहीं हुआ है। इस कारण मैं प्रश्न के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता था कि इस धूणा का विकास कब किया जाएगा और अब तक न हुआ हो तो आने वाले समय में क्या योजना है। लेकिन मेरा यह प्रश्न मंजूर न होने के कारण इस मुद्दे पर सदन में कोई चर्चा नहीं हुई और मुझे कोई जवाब भी नहीं मिला। इसलिए इस सार्वजनिक मंच के माध्यम से सरकार से अनुरोध है कि जहां करोड़ों रुपयों का खर्च अन्य जगहों पर किया जाता है, वहां संत श्री वेलनाथ बापु के धूणा के पलासवा गांव में विकास किया जाए, जिससे देश-विदेश के श्रद्धालु और यात्री संत श्री वेलनाथ बापु और उनके समाज के योगदान के बारे में जान सकें।
गोपाल इटालिया ने आगे कहा कि आज विधानसभा के अंदर अध्यक्ष ने एक फैसला सुनाया था। फैसले में उन्होंने कहा कि विधानसभा के सदन के अंदर जिस विषय पर चर्चा न हुई हो, उस चर्चा को बाहर नहीं करना चाहिए। यह बात उनकी सही है, क्योंकि विधानसभा के अंदर चर्चा करने की समय सीमा होती है और हर विषय पर चर्चा नहीं हो सकती। जैसे कि आज ही मैंने फिक्स वेतन के बारे में सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को सरकार द्वारा दी जाने वाली फीस के बारे में प्रश्न पूछा था। सरकार का जवाब मुझे मिला है, लेकिन उस पर चर्चा नहीं हुई। अब जवाब मिला है तो जिस विषय पर अंदर चर्चा नहीं हुई, उस विषय पर मेरा अपना राजनीतिक, सामाजिक और तात्विक अभिप्राय क्या है, यह मैं मीडिया के सामने कहने के लिए स्वतंत्र हूं। सरकार ने मुझे लिखकर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट में फिक्स वेतन के मामले की सुनवाई के लिए एक मुद्दत के दो लाख रुपये लेकर पांच-पांच, दस-दस वकील सरकार ने रखे हैं। इस पर सदन में चर्चा नहीं हुई, लेकिन बाहर तो कहना पड़ेगा कि सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि कर्मचारियों को वेतन देने के बजाय वकीलों के पीछे एक मुद्दत के दो लाख रुपयों का खर्च करती है। यह जनता के पैसे हैं और वेतन दिया जाए तो भी जनता के पैसे हैं। तो जिस मुद्दत, जिस विषय पर और जिस मुद्दे पर समय के अभाव में विधानसभा में चर्चा नहीं हो सकती, उस विषय पर हमारा राजनीतिक अवलोकन क्या है, हमारा सामाजिक अवलोकन क्या है और हमारी नीति क्या है, यह हम कहने के लिए स्वतंत्र हैं। और ऐसा कहना विपक्ष के रूप में हमारी जिम्मेदारी भी है।
