पंजाब सरकार के खान एवं भूविज्ञान मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने घोषणा की कि फाजिल्का जिले के चोहरियानवाली क्षेत्र में पोटाश के लिए नई “जी-4 पोटाश अन्वेषण परियोजना” को राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण एवं विकास ट्रस्ट (NMET) द्वारा मंजूरी दे दी गई है। इस परियोजना का कुल स्वीकृत बजट 1903.11 लाख रुपये है और इसे 48 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लागू किया जाएगा।
परियोजना की रूपरेखा और समयसीमा
इस परियोजना का संचालन मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड द्वारा किया जाएगा। परियोजना की अवधि 21 महीने निर्धारित की गई है और इसकी प्रारंभिक समीक्षा नौ महीने बाद की जाएगी। पहले चरण में 3200 मीटर के ग्रिड अंतराल पर कुल 5700 मीटर ड्रिलिंग के साथ छह बोरहोल खोदे जाएंगे। समीक्षा के बाद, दूसरे चरण में संभावित क्षेत्रों में 1600 मीटर ग्रिड अंतराल पर 8550 मीटर ड्रिलिंग के साथ नौ अतिरिक्त बोरहोल खोदने की योजना है।
पिछली पहलों और प्रयासों का उल्लेख
मंत्री बरिंदर गोयल ने याद दिलाया कि जनवरी 2026 में गुजरात के गांधीनगर में आयोजित राष्ट्रीय खनिज चिंतन शिविर में उन्होंने पंजाब में पोटाश अन्वेषण की जरूरत पर जोर दिया था। उन्होंने फाजिल्का जिले में पोटाश के संभावित भंडारों की पहचान पर प्रकाश डाला और 2025-26 के फील्ड सीजन में ड्रिलिंग और भूवैज्ञानिक मानचित्रण कार्यों में तेजी लाने का आह्वान किया था।
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उन्होंने कहा कि पोटाश की खोज और खनन का विकास राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और किसान कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पंजाब सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों से प्रदेश में पोटाश अन्वेषण को प्राथमिकता देने और समय पर कार्यवाही सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।
भविष्य की योजनाएँ
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने 2026-27 के फील्ड सीजन में फाजिल्का जिले के केरा खेड़ा ब्लॉक, सैय्यदवाला ब्लॉक और कंधवाला रामसरा ब्लॉक में पोटाश के प्रारंभिक सर्वेक्षण और अन्वेषण प्रस्तावित किए हैं। इसमें कुल 15 चिन्हित ड्रिलिंग स्थल शामिल हैं। मंत्री बरिंदर गोयल ने सभी प्रस्तावित ब्लॉकों के समय पर कार्यान्वयन पर जोर दिया ताकि पंजाब के पोटाश संसाधन को मजबूत किया जा सके।
महत्व और राष्ट्रीय लाभ
बरिंदर गोयल ने कहा कि पोटाश देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है, क्योंकि लगभग 99 प्रतिशत पोटाश की जरूरत आयात के माध्यम से पूरी होती है। घरेलू अन्वेषण और उत्पादन में प्रगति न केवल कृषि क्षेत्र को मजबूत करेगी, बल्कि भारत की दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी सहारा देगी।

