शनि स्तोत्र: साढ़ेसाती से बचाव के लिए करें इस चमत्कारी स्तोत्र का पाठ, बरसेगी शनिदेव की कृपा

by Neha
शनि स्तोत्र: साढ़ेसाती से बचाव के लिए करें इस चमत्कारी स्तोत्र का पाठ, बरसेगी शनिदेव की कृपा

साढ़ेसाती से बचाव के लिए करें शनि स्तोत्र का पाठ। जानें शनि मंत्र और दशरथ कृत स्तोत्र के फायदे, नए साल में बरसेगी शनिदेव की कृपा और जीवन में आएगी सफलता व समृद्धि।

नए साल में कुछ राशि वालों पर शनिदेव की कृपा होगी, वहीं कुछ जातकों को उनकी परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है। ज्योतिषियों के अनुसार, शनिदेव की पूजा से करियर में सफलता मिलती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। साढ़ेसाती के प्रभाव को कम करने के लिए रोजाना शनि मंत्रों का जाप और दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करना बेहद लाभकारी माना जाता है।

साढ़ेसाती के समय शनि देव की पूजा क्यों जरूरी है?

शनि ग्रह न्याय का कारक माना जाता है। इसका शुभ या अशुभ प्रभाव जातक के जीवन पर गहरा असर डालता है। साढ़ेसाती के समय शनि देव की कृपा प्राप्त करने से करियर में उन्नति होती है, आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और जीवन में आने वाली परेशानियां कम होती हैं।

शनि देव के प्रमुख मंत्र

साढ़ेसाती से राहत पाने और शनिदेव की कृपा पाने के लिए इन मंत्रों का रोजाना जाप करें:

  1. ऊँ शं शनैश्चाराय नमः।

  2. ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः।

  3. ॐ नीलाजंन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छाया मार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।

  4. अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेहर्निशं मया। दासोयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर।।

  5. ऊँ श्रां श्रीं श्रूं शनैश्चाराय नमः।

  6. ऊँ हलृशं शनिदेवाय नमः।

  7. ऊँ एं हलृ श्रीं शनैश्चाराय नमः।

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दशरथ कृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।

नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:॥

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:॥

दशरथ उवाच:

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् ।

अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित् ॥

शन्यष्टक स्तोत्र

कोणोऽन्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः पिंगलमन्दसौरिः।

नित्यं स्मृतो यो हरते च पीडां तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

सुरासुराः किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च।

पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतंगभृङ्गाः।

पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

देशाश्च दुर्गाणि वनानि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि।

पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा।

प्रीणाति मन्त्रैर्निजवासरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्यजले गुहायाम्।

यो योगिनां ध्यानगतोऽपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

अन्यप्रदेशात्स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे स नरः सुखी स्यात्।

गृहाद् गतो यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

स्रष्टा स्वयंभूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरीशो हरते पिनाकी।

एकस्त्रिधा ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभाते नित्यं सुपुत्रैः पशुबान्धवैश्च।

पठेत्तु सौख्यं भुवि भोगयुक्तः प्राप्नोति निर्वाणपदं तदन्ते॥

कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः।

सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः॥

एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्।

शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद्भविष्यति॥

जो भी व्यक्ति प्रात:काल उठकर शन्यष्टक का पाठ करता है, उसे साढ़ेसाती और शनि ग्रह से संबंधित परेशानियों से सुरक्षा मिलती है।

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