क्यों धारण किया भगवान शिव ने काल भैरव का रौद्र रूप? जानें शिव पुराण की रहस्यमयी कथा

क्यों धारण किया भगवान शिव ने काल भैरव का रौद्र रूप? जानें शिव पुराण की रहस्यमयी कथा

शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव ने ब्रह्मा जी के अहंकार को समाप्त करने के लिए काल भैरव का रौद्र रूप धारण किया। जानें काल भैरव की उत्पत्ति की रोचक कथा।

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ शिव पुराण में भगवान शिव के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है। इन्हीं में से एक अत्यंत उग्र और शक्तिशाली स्वरूप है काल भैरव, जिसे भगवान शिव का रौद्र अवतार माना जाता है।

ब्रह्मा जी के अहंकार से जुड़ी कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच यह विवाद हुआ कि सृष्टि का सर्वोच्च रचनाकार कौन है। इस दौरान ब्रह्मा जी ने स्वयं को श्रेष्ठ बताना शुरू किया।

जब वे ऋषि-मुनियों के पास पहुंचे, तो उन्होंने भगवान शिव को सृष्टि का सर्वोच्च बताया। यह सुनकर ब्रह्मा जी क्रोधित हो गए और उन्हें भगवान शिव से ईर्ष्या होने लगी। अहंकार और क्रोध में आकर उन्होंने महादेव के प्रति अपशब्द कह दिए।

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भगवान शिव का रौद्र रूप और काल भैरव की उत्पत्ति

ब्रह्मा जी के इस अपमानजनक व्यवहार से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपना रौद्र स्वरूप धारण किया। इसी उग्र रूप से काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्मा जी के अहंकार को समाप्त करने के लिए उनके पांचवें सिर का वध कर दिया, जिसके बाद उन्हें ब्रह्म हत्या के पाप का दोष लगा।

ब्रह्म हत्या से मुक्ति और काशी से संबंध

शिवजी के निर्देश पर काल भैरव ने इस पाप से मुक्ति के लिए विभिन्न तीर्थों की यात्रा की। अंततः वे काशी पहुंचे, जहां उन्होंने तप और साधना कर ज्ञान प्राप्त किया।

भगवान शिव ने काशी में प्रकट होकर उन्हें वहां का रक्षक (कोतवाल) नियुक्त किया। तभी से काल भैरव को काशी का संरक्षक देवता माना जाता है।

शिव पुराण में वर्णन

काल भैरव की उत्पत्ति और उनके स्वरूप का विस्तार से वर्णन शिव पुराण में मिलता है, जहां उन्हें धर्म, न्याय और समय के रक्षक के रूप में बताया गया है।

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