जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिन भगवान क्यों रहते हैं “अस्वस्थ”? जानें अनसर काल की रहस्यमयी कथा

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिन भगवान क्यों रहते हैं “अस्वस्थ”? जानें अनसर काल की रहस्यमयी कथा

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026:: जानें स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिन भगवान जगन्नाथ क्यों “बीमार” रहते हैं और अनसर काल की रहस्यमयी कथा क्या है।

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 का इंतजार देश-विदेश के श्रद्धालुओं को पूरे वर्ष रहता है। ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की यह विश्व प्रसिद्ध यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और भक्ति का अनोखा संगम मानी जाती है। हर साल लाखों भक्त भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं।

स्नान पूर्णिमा के बाद शुरू होता है अनसर काल

रथ यात्रा से पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नान पूर्णिमा का आयोजन किया जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 कलशों के पवित्र जल से विशेष स्नान कराया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस भव्य स्नान के बाद भगवान “अस्वस्थ” हो जाते हैं और उन्हें बुखार आ जाता है। इसी कारण वे लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को अनसर काल (अनवसर काल) कहा जाता है, जिसमें श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के पट बंद रहते हैं।

भक्त माधव दास की कथा से जुड़ी मान्यता

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के परम भक्त माधव दास लंबे समय तक गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। उन्होंने अपने आराध्य से पीड़ा दूर करने की प्रार्थना की।

कहते हैं कि भगवान ने उन्हें बताया कि उनके जीवन में केवल 15 दिन की बीमारी शेष है। लेकिन भक्त की पीड़ा देखकर भगवान जगन्नाथ ने उन 15 दिनों का कष्ट स्वयं अपने ऊपर ले लिया। इसके बाद माधव दास स्वस्थ हो गए, जबकि भगवान “अस्वस्थ” हो गए। इसी घटना के बाद से अनसर काल की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।

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औषधीय उपचार और विशेष भोग की परंपरा

अनसर काल के दौरान भगवान को सामान्य भोग अर्पित नहीं किया जाता। उनकी सेवा विशेष वैद्य परंपरा के अनुसार की जाती है। इस दौरान उन्हें औषधीय जड़ी-बूटियों से बने काढ़े और विशेष औषधीय भोग अर्पित किए जाते हैं ताकि वे शीघ्र स्वस्थ हो सकें।

नवयौवन दर्शन के बाद होती है रथ यात्रा

15 दिनों के विश्राम के बाद जब भगवान जगन्नाथ स्वस्थ होते हैं, तब नवयौवन दर्शन के माध्यम से भक्तों को उनके दर्शन प्राप्त होते हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथ यात्रा पर निकलते हैं।

भक्ति और करुणा का प्रतीक है यह परंपरा

जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी यह कथा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के गहरे प्रेम और करुणा का प्रतीक भी है। यह परंपरा दर्शाती है कि सच्ची भक्ति में भगवान भी अपने भक्त के कष्ट को साझा करने के लिए आगे आते हैं।

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