Google की पैरेंट कंपनी ने बड़ा ऐलान किया है कि वह आने वाले दस सालों में अपने कंप्लायंस सिस्टम को पूरी तरह सुधारने के लिए 500 मिलियन डॉलर (लगभग 4,277 करोड़ रुपये) खर्च करेगी। यह कदम कंपनी ने एक शेयरहोल्डर डेरिवेटिव केस के सेटलमेंट के तहत उठाया है, जिसमें Google पर आरोप लगाया गया था कि उसने अपने टॉप एक्जीक्यूटिव्स के जरिये एंटी-ट्रस्ट नियमों की अनदेखी की।
इस फैसले के तहत Google कई आंतरिक बदलाव करेगा। सबसे पहले, कंपनी एक विशेष बोर्ड कमेटी बनाएगी जो केवल कंप्लायंस और रिस्क पर ध्यान देगी और यह वित्त या ऑडिट से पूरी तरह अलग होगी। इसके अलावा, एक सीनियर वाइस प्रेजिडेंट लेवल की टीम बनाई जाएगी जो सीधे CEO सुंदर पिचाई को रिपोर्ट करेगी और रेगुलेटरी मामलों को संभालेगी। साथ ही, प्रोडक्ट मैनेजर्स और एक्सपर्ट्स की एक टीम बनेगी जो प्रोडक्ट्स को रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स के अनुसार ऑपरेट करेगी।
हालांकि Alphabet ने इस केस में कोई गड़बड़ी स्वीकार नहीं की है, लेकिन DOJ (यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट) की जांच और ट्रायल्स को देखते हुए यह कदम कंपनी की डैमेज कंट्रोल रणनीति माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर Google दोषी पाया गया तो Chrome ब्राउजर को अलग करने या सर्च डेटा साझा करने जैसी पेनल्टी का सामना करना पड़ सकता है।
यह बदलाव Google के लिए केवल लीगल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक दिशा परिवर्तन भी है, जिसमें कंपनी अब कंप्लायंस और पारदर्शिता पर उतना ही जोर दे रही है जितना वह AI और प्रोडक्ट इनोवेशन पर देती है।