दिल्ली में तीन दिवसीय शब्दोत्सव का उद्घाटन, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव पर जोर दिया

by Neha
दिल्ली में तीन दिवसीय शब्दोत्सव का उद्घाटन, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव पर जोर दिया

दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने तीन दिवसीय सांस्कृतिक और साहित्यिक शब्दोत्सव का उद्घाटन किया, युवाओं को संस्कृति और जड़ों से जोड़ने पर जोर।

दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने तीन दिवसीय सांस्कृतिक और साहित्यिक शब्दोत्सव का उद्घाटन किया। उन्होंने इसे अतीत और वर्तमान का जीवंत संवाद बताते हुए कहा कि यह आयोजन लोगों को अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ने का संदेश देता है। मुख्यमंत्री ने परोक्ष रूप से उन लोगों पर भी निशाना साधा जो विदेश से देश की आलोचना करते हैं और कभी अपने जड़ों से जुड़े ही नहीं थे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह शब्दोत्सव बच्चों और युवाओं को आधुनिकता के साथ संस्कृति और मूल्यों से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ी रहेगी, तो समाज में गलत प्रवृत्तियों की संभावना कम होगी।

उद्घाटन सत्र की शुरुआत वंदे मातरम गीत के साथ हुई। केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षरता या तकनीकी कौशल देना नहीं है, बल्कि व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना भी है। उन्होंने भारत की संस्कृति की प्राचीनता और समृद्धि पर जोर देते हुए कहा कि पाठ्यक्रमों में इसे प्रतिबिंबित करना आवश्यक है, ताकि युवा केवल शिक्षित न बल्कि संस्कारी भी बनें।

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भाषा और संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा ने बताया कि शब्दोत्सव केवल साहित्यिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारत विरोधी और नक्सली विचारधाराओं पर वैचारिक सर्जिकल स्ट्राइक भी है। उन्होंने कहा कि घातक और हिंसक विचारों को जड़ से मिटाने के लिए यह आयोजन हर साल शृंखला के रूप में आयोजित किया जाएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि भारतीय परंपरा में शब्दों को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि आराधना और शक्ति का रूप माना गया है। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर जैसी महान विभूतियों के उदाहरण दिए जिन्होंने शब्दों के माध्यम से साहित्य और संस्कृति को संरक्षित किया।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने यह भी कहा कि वर्तमान डिजिटल और एआई युग में तकनीक कितनी भी विकसित क्यों न हो, वह मानवीय मूल्यों और विवेक का स्थान नहीं ले सकती। यदि शब्दों और ज्ञान के ज्ञाता आधुनिक तकनीक से सही ढंग से जुड़ेंगे, तभी समाज में इसका सकारात्मक प्रभाव सुनिश्चित किया जा सकता है।

उद्घाटन सत्र में सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष और कई गणमान्य लोग भी उपस्थित रहे। इस आयोजन में संस्कृति, शिक्षा और वैचारिक शुद्धता पर विशेष जोर दिया गया।

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