चैतर वसावा: “भणशे गुजरात” के दावे पर सवाल: नर्मदा में 549 और दाहोद में 1284 शिक्षकों की कमी

by Neha
चैतर वसावा: “भणशे गुजरात” के दावे पर सवाल: नर्मदा में 549 और दाहोद में 1284 शिक्षकों की कमी

चैतर वसावा ने नर्मदा में 549 और दाहोद में 1284 शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठाया। 145 स्कूल एक शिक्षक से चलने पर उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था पर सरकार को घेरा।

आम आदमी पार्टी के डेडियापाडा के विधायक चैतर वसावा ने आज विधानसभा में पत्रकार परिषद आयोजित कर बताया कि आज मैंने शिक्षा मंत्री से कुछ गंभीर सवाल पूछे थे और सरकार की ओर से उनके जवाब मिले थे। नर्मदा और दाहोद जिला देश के अति पिछड़े जिलों में से एक हैं। इन जिलों में शिक्षा का स्तर खराब होने के कारण ये जिले पिछड़े रह गए हैं। तो मैंने शिक्षकों के मुद्दे पर सवाल किया था और उसके जवाब में सरकार की ओर से बताया गया कि नर्मदा में 549 शिक्षकों की कमी है और दाहोद में 1284 शिक्षकों की कमी है।

इसके बाद पूरक प्रश्न में हमने पूछा कि कितनी स्कूलें एक शिक्षक से चल रही हैं तो जवाब मिला कि नर्मदा जिले में 145 स्कूलें एक शिक्षक से चल रही हैं। विचार कीजिए कि एक स्कूल में कक्षा 1-5 हो या 1-8 हो तो वह एक शिक्षक सभी को कैसे पढ़ाएगा? और वह शिक्षक यदि सरकारी बैठकों में जाएगा या SIR की कार्यवाही करने जाएगा तो उस समय बच्चों को कौन पढ़ाएगा? गरवी गुजरात की यह वरवी वास्तविकता है कि नर्मदा हो, दाहोद हो, छोटाउदेपुर हो, पंचमहल हो, भरूच हो या डांग हो, इन सभी जगहों पर आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी है और सरकार ने आज इसे स्वीकार किया है। इसकी वैकल्पिक व्यवस्थाओं के बारे में सरकार कहती है कि अभी वह काम विचाराधीन है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार में गंभीरता नहीं है।

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आगे विधायक चैतर वसावा ने बताया कि स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए कमरे भी नहीं हैं। कई बच्चे किराए के मकान में पढ़ते हैं, पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ते हैं, ओसारा पर बैठकर पढ़ते हैं और कई स्कूलों में एक ही कक्षा में चार-चार कक्षाओं के बच्चे बैठकर पढ़ते हैं। हर वर्ष बजट में हजारों करोड़ की व्यवस्था की जाती है तो फिर आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों के कमरे क्यों नहीं बनाए जाते? आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षकों की भर्ती क्यों नहीं की जाती? आज मंत्री ने बताया कि ज्ञान सहायकों के माध्यम से भर्ती करेंगे, जबकि हकीकत यह है कि ज्ञान सहायक 11 माह के करार पर शिक्षक भर्ती योजना है। यदि शिक्षक स्वयं करार पर होगा और स्थायी नहीं होगा तथा उसे अपने करियर की चिंता होगी तो वह बच्चों को अच्छी तरह कैसे पढ़ा पाएगा? यह सवाल हम गुजरात सरकार से पूछते हैं। 30 वर्षों की भाजपा सरकार आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के कमरे उपलब्ध कराने और शिक्षकों की पूर्ति करने में पूरी तरह विफल रही है, इसलिए अब जनता को जागना होगा और सरकार से जवाब मांगना होगा।

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