IPL में कौन-सी गेंद का इस्तेमाल होता है और क्या है उसकी कीमत?

by editor
IPL में कौन-सी गेंद का इस्तेमाल होता है और क्या है उसकी कीमत?

IPL में चौके-छक्के लगते हुए तो आपने खूब देखे होंगे और उनका पूरा आनंद भी लिया होगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन गेंदों पर ये जबरदस्त शॉट्स लगते हैं, वो कौन सी होती हैं और उनकी कीमत कितनी होती है?

IPL: सिर्फ ग्लैमर नहीं, भरपूर रोमांच और रन बरसाने वाली गेंद!

IPL सिर्फ चमक-दमक वाली क्रिकेट नहीं है, बल्कि इसमें क्रिकेट फैंस के लिए जबरदस्त रोमांच और मनोरंजन भी शामिल है। इस रोमांच का असली कारण है मैदान पर रनों की बारिश। IPL में बल्लेबाजों का दबदबा ज्यादा रहता है, और इसकी एक बड़ी वजह वह गेंद है, जो अगर सही तरीके से बल्ले पर आ जाए, तो सीधा बाउंड्री के पार जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि IPL में कौन-सी गेंद इस्तेमाल होती है और उसकी कीमत कितनी होती है? आइए, जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।

IPL में कौन-सी गेंद का इस्तेमाल होता है और उसकी कीमत कितनी है?

IPL में उपयोग की जाने वाली गेंद से जुड़े ये दोनों सवाल हर क्रिकेट फैन के लिए दिलचस्प हैं। क्रिकेट प्रेमियों में इस गेंद और उसकी कीमत को लेकर हमेशा उत्सुकता बनी रहती है। तो चलिए, आपको इन दोनों सवालों के जवाब बताते हैं।

IPL में कूकाबूरा गेंद का इस्तेमाल – क्या है इसकी खासियत और इतिहास?

IPL में उपयोग की जाने वाली गेंद कूकाबूरा होती है, जिसका रंग सफेद होता है। इस गेंद का इस्तेमाल सिर्फ IPL में ही नहीं, बल्कि ICC टूर्नामेंट और बाइलेटरल सीरीज में भी किया जाता है। व्हाइट बॉल क्रिकेट की बात करें तो दुनियाभर में ज्यादातर मुकाबलों में कूकाबूरा गेंद का ही इस्तेमाल होता है। लेकिन आखिर इस गेंद में ऐसा क्या खास है? इसका जवाब जानने के लिए हमें इसके इतिहास को समझना होगा।

कूकाबूरा गेंद का इतिहास
कूकाबूरा गेंद का सफर 1970 के दशक में शुरू हुआ, जब वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट और डे-नाइट मैचों का कॉन्सेप्ट आया। उसी दौर में पहली बार कूकाबूरा ने सफेद गेंद बनाई, जो धीरे-धीरे सफेद गेंद वाले क्रिकेट की पहचान बन गई।

कूकाबूरा गेंद की खासियत क्या है?

इस गेंद की सबसे खास बात है इसकी बेहतरीन लेदर क्वालिटी, जो इसे लंबी दूरी तक उड़ने में मदद करती है। यही कारण है कि IPL में बड़े-बड़े छक्के लगते हैं। अगर इस गेंद की बनावट पर ध्यान दें, तो इसकी सीम ज्यादा उभरी हुई नहीं होती। गेंद की सीम के अंदर की सिर्फ दो परतों की सिलाई हाथों से होती है, जबकि बाकी सिलाई मशीन से की जाती है। यही वजह है कि यह गेंद बल्लेबाजों के लिए फायदेमंद साबित होती है और मैदान पर चौकों-छक्कों की बारिश होती है।

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