‘अंसारी-तिवारी भाई-भाई’ भूल चूक माफ में Rajkumar Rao के इस डायलॉग का क्या अर्थ है?

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‘अंसारी-तिवारी भाई-भाई’ भूल चूक माफ में Rajkumar Rao के इस डायलॉग का क्या अर्थ है?

Rajkumar Rao और वामिका गब्बी की फिल्म भूल चूक माफ एक रोमांटिक कॉमेडी फैंटेसी है। कहानी का मुख्य हिस्सा प्रेमी रंजन तिवारी और प्रेमिका तितली मिश्रा के प्यार और उनकी नोक-झोंक पर केंद्रित है। लेकिन कहानी में एक नया किरदार हामिद अंसारी भी शामिल होता है, जो पूरी फिल्म की दिशा बदल देता है। इस फिल्म को करण शर्मा ने लिखा और निर्देशित किया है, जबकि संवाद हैदर रिज़वी ने तैयार किए हैं।

Rajkumar Raoऔर वामिका गब्बी की नई फिल्म भूल चूक माफ को मैंने थोड़ी देर से देखा, इसलिए इस पर लिखने में देरी हुई—इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ। सच कहूं तो यह भूलचूक माफ़ का ही संदेश है। फिल्म का मुख्य किरदार राजकुमार राव लंबे समय बाद समझ पाता है कि नेक काम करना चाहिए और किसी का दिल कभी दुखाना नहीं चाहिए। अगर दिल दुखेगा तो मनचाहा परिणाम नहीं मिलेगा, मन्नत पूरी होने में रुकावट आएगी, और मन्नत पूरी न होने से मन विचलित रहेगा। फिल्म में रंजन तिवारी के साथ भी यही होता है।

करण शर्मा निर्देशित इस फिल्म में Rajkumar Rao का किरदार रंजन तिवारी है, जो वामिका गबत प्रेमिका तितली मिश्रा से प्यार करता है। दोनों शादी करना चाहते हैं, लेकिन शादी की तारीख तय होने के बावजूद कई परेशानियां आती रहती हैं। इसकी मुख्य वजह हामिद अंसारी नाम का एक शख्स है। हामिद अंसारी कौन है और क्यों उसकी वजह से रंजन और तितली की शादी में बाधा आती है—इसी पहेली को समझना इस फिल्म की पूरी कहानी का आधार है।

फिल्म की कहानी इंसानी जज्बातों से गहराई से जुड़ी है। अंसारी-तिवारी की पूरी समस्या नौकरी, रोजगार, खेती-किसानी, सिंचाई, खुशहाली, जरूरतमंदों को मौके देना, इंसानियत, भाईचारा और सामाजिक भावना जैसे मुद्दों से जुड़ी है। यह कहानी दो प्रेमी जोड़ों की हँसी-खुशी और नोंक-झोंक से शुरू होकर धीरे-धीरे इन गंभीर विषयों तक पहुँचती है। फिल्म रोमांटिक कॉमेडी ड्रामा है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह जज्बातों और सामाजिक मुद्दों से और जुड़ती जाती है।

फिल्म में दो उम्मीदवारों की कहानी भी दिखती है — एक जो योग्य है और वास्तव में नौकरी का हकदार है, और दूसरा जिसने रिश्वत देकर नौकरी हासिल की है। इसी वजह से रंजन तिवारी, जो रिश्वत लेकर नौकरी पाने वाला पात्र है, अंदर से उलझन में रहता है क्योंकि उसकी शादी की तारीख तय होने के बावजूद भी बार-बार कुछ अटका रहता है।

जब रंजन परेशान होकर गंगा में कूदने का मन बनाता है, तो उसकी मुलाकात हामिद अंसारी से होती है, जो सरकारी नौकरी न मिलने से व्यथित है। हामिद बताता है कि उसके गांव के किसान दस सालों से खेती और सिंचाई की दिक्कतों से जूझ रहे हैं। वह सिंचाई विभाग में नौकरी पाने के लिए मेहनत करता रहा, लेकिन नौकरी नहीं मिल पाई। दूसरी तरफ रंजन, जिसने रिश्वत देकर नौकरी ली है, इस स्थिति में फंसा हुआ है। इसी बीच वह कहता है, “अच्छा भइया, आजम से अंसारी-तिवारी भाई-भाई, मिलकर इस समस्या को दूर करेंगे।”

फिर रंजन, हामिद को भगवान दास (संजय मिश्रा) के पास ले जाता है, जिसने रिश्वत देकर नौकरी पाई है। जब रंजन को पता चलता है कि असली हकदार हामिद था, तो उसे गहरी ग्लानि होती है और समझ आता है कि उसकी शादी में बाधा क्यों आ रही थी। इसके आगे की कहानी जानने के लिए फिल्म देखनी होगी, या ओटीटी रिलीज का इंतजार करना होगा।

फिल्म का रंगीन और धार्मिक बैकग्राउंड वाराणसी का है, जिसमें गंगा घाट, भोले शंकर, नाव, पंडे-पुजारी, गौ-माता, बीड़ी-चिलम, साधु-संत, पतली गलियां, और लोगों की मस्ती साफ झलकती है। यह माहौल फिल्म को और भी मनोरंजक बनाता है।

फिल्म यह भी बताती है कि समाज में ज्यादातर लोग अपने लिए सोचते हैं, लेकिन जो दूसरों के लिए सोचता है और नेक काम करता है, वही इतिहास बनाता है। साथ ही, इंसान को अपने कर्म करते रहना चाहिए और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए — यही गीता का संदेश फिल्म के अंत में दिया जाता है।

Rajkumar Rao और वामिका गब्बी की जोड़ी फिल्म में बहुत अच्छी लगती है। संजय मिश्रा का रोल यादगार है, खासकर आखिरी सीन में उनका भाषण। सीमा पाहवा, रघुवीर यादव और जाकिर हुसैन ने भी अपने किरदारों में जान डाल दी है।

फिर भी, निर्देशक करण शर्मा से एक सुझाव है कि फिल्म के मध्य में ‘29 तारीख’ की पहेली को ज्यादा उलझा दिया गया है, जो थोड़ी बोझिल लगती है और दर्शकों को परेशान कर सकती है। इसे थोड़ा कम और सरल बनाना बेहतर होता। इसके अलावा, तितली के किरदार में थोड़ी वैरायटी होती तो बेहतर रहता। बाकी गीत-संगीत फिल्म के हास्य को बढ़ाते हैं और माहौल को हल्का-फुल्का रखते हैं।

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