AAP गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर उठाए सवाल: कहा, ‘नई गुलामी की खतरनाक शुरुआत

AAP गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर उठाए सवाल: कहा, ‘नई गुलामी की खतरनाक शुरुआत

भारत‑अमेरिका ट्रेड डील पर AAP गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने इसे किसानों, कृषि क्षेत्र और देश की आर्थिक‑राजनीतिक स्वायत्तता के लिए खतरनाक बताते हुए नई गुलामी की आशंका जताई।

अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के मुद्दे पर दिल्ली के पूर्व कैबिनेट मंत्री और आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज पूरे देश में इस मुद्दे पर चर्चा चल रही है कि भारत की केंद्र सरकार ने अमेरिका के साथ यह ट्रेड डील क्यों की? सरकार कहती है कि इससे भारत को फायदा होगा। सरकार दावा कर रही है कि अमेरिका के साथ ऐसा व्यापार समझौता हुआ है, जो न तो इतिहास में कभी हुआ है, न वर्तमान में है और न भविष्य में होगा। सरकार कहती है कि नाचो, गाओ, झूमो, ताली बजाओ, थाली बजाओ और मिठाइयां बांटो, लेकिन लोग खुश नहीं हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? आज देश की राजधानी दिल्ली से लेकर भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में फैले गांवों तक लोगों के मन में सवाल है कि आखिर भारत सरकार ने अचानक अमेरिका के साथ यह समझौता क्यों किया? क्या इस व्यापार समझौते से भारत को फायदा होगा या नुकसान? इस समझौते में अमेरिका को क्या फायदा है? अमेरिका इतना खुश क्यों है? लोगों के मन में यह सवाल भी है कि क्या यह समझौता समानता का है या फिर अमेरिका ने आदेश देकर दबाव बनाकर भारत पर यह ट्रेड डील थोप दी है और हम मजबूरी में मिठाइयां बांट रहे हैं?

आगे AAP गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने कहा कि लोगों के मन में यह सवाल भी है कि जब अमेरिका भारतीय सामान पर टैरिफ 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर रहा है, तो उसी समय भारत सरकार ने अमेरिका से आने वाले सामान पर टैरिफ 0 प्रतिशत क्यों कर दिया? यह भी सवाल है कि अगर रूस से भारत को सस्ते दाम पर क्रूड ऑइल मिल रहा है, तो फिर महंगे दाम पर अमेरिका और वेनेजुएला से क्रूड ऑइल खरीदने के लिए भारत सरकार क्यों तैयार हो गई? यह भी सवाल उठता है कि इस व्यापार समझौते में अगले पांच वर्षों में 45 लाख करोड़ रुपये के आयात खर्च को तय किया गया है, लेकिन अमेरिका भारत से कितने का आयात करेगा, इसका जिक्र क्यों नहीं है? इन सभी सवालों के कारण लोगों के मन में भ्रम है। सवाल कई हैं, लेकिन जवाब नहीं हैं। यह पहली बार हो रहा है कि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले, लोकतांत्रिक परंपराओं के साथ आगे बढ़ने वाले, गौरवशाली संस्कृति और सभ्यता वाले देश ने अमेरिका के साथ ऐसा व्यापार समझौता किया है। जब लोग पूछते हैं कि इस समझौते के बाद रूस से किफायती दाम पर तेल खरीदना जारी रहेगा या बंद हो जाएगा, तो पत्रकार जब वाणिज्य मंत्री से पूछते हैं तो वे कहते हैं कि हमें नहीं पता, विदेश मंत्रालय से पूछिए। पत्रकार विदेश मंत्री से पूछते हैं तो वे कहते हैं कि हमें नहीं पता, वाणिज्य मंत्री से पूछिए। इस समझौते का नेतृत्व वाणिज्य मंत्री कर रहे हैं, फिर भी वे सीधे सवाल का जवाब क्यों नहीं दे पा रहे हैं?

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आगे AAP गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने कहा कि जिस ट्रेड डील का फ्रेमवर्क सार्वजनिक किया गया है, उसमें साफ लिखा है कि अमेरिका ने धमकी भरे स्वर में भारत को आदेश दिया है कि अगर भारत रूस से तेल खरीदने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जारी रखेगा, तो 25 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ लगाया जाएगा और इसकी निगरानी अमेरिका करेगा। क्या अब अमेरिका भारत की निगरानी करेगा? क्या भारत के लोग गुलाम बन गए हैं? इसी तरह ईस्ट इंडिया कंपनी ने आकर भारत में पैर जमाए थे और धीरे-धीरे ब्रिटेन में बैठे वायसरॉय भारत का शासन चलाने लगे थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि वैसी ही नई परिस्थितियां फिर से बनाई जा रही हैं? आज जब हमारे पास लोकतंत्र की मजबूत विरासत है, समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है और विशाल जनसंख्या वाला देश है, तब अगर अमेरिका सार्वजनिक रूप से लिखित में भारत को धमकी दे, भारत पर नजर रखने की बात करे और हमारे शासक बेधड़क इसे स्वीकार कर सार्वजनिक करें, तो आने वाले कल में क्या होगा?

आगे AAP गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने कहा कि इस ट्रेड डील को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी आबादी, जो रोजगार के लिए निर्भर है, वह कृषि क्षेत्र है। पहली बार भारत अपना कृषि क्षेत्र अमेरिका के लिए खोल रहा है। किन शर्तों पर खोल रहा है? ट्रेड डील के फ्रेमवर्क में जो दस्तावेज सामने आए हैं, उसकी पहली ही पंक्ति में लिखा है कि भारत अमेरिका के औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर शून्य कर (जीरो टैक्स) लागू करेगा। इसका क्या मतलब होगा? भारत कृषि प्रधान देश है। यहां करोड़ों लोगों का जीवन खेती, कृषि उत्पादों और पशुपालन पर निर्भर है। अगर अमेरिका के लिए सभी दरवाजे खोल दिए जाएं, जहां अमेरिका अपने किसानों को करोड़ों रुपये की सब्सिडी देता है, और दूसरी ओर भारत का किसान किस्मत के भरोसे सुबह से शाम तक, दिन-रात पसीना बहाकर मुश्किल से अपना गुजारा करता है। बेटी की शादी करनी हो तो कर्ज लेना पड़ता है, जमीन बेचनी पड़ती है। गांवों के युवा बेरोजगार भटक रहे हैं, गांव से शहर की ओर पलायन कर रहे हैं। किसानों के बच्चों के पास रोजगार नहीं है। कुछ लोग कॉन्ट्रैक्ट नौकरी करते हैं और कुछ एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते हैं। ऐसी स्थिति में अगर सरकार किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं कर सकती, उनके बेटा-बेटियों को रोजगार नहीं दे सकती, तो कम से कम अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए दरवाजे खोलकर उन्हें बर्बाद करने का पाप तो केंद्र सरकार को नहीं करना चाहिए। सरकार दलीलें देती है कि यह क्षेत्र खोला है, वह क्षेत्र नहीं खोला, लेकिन हकीकत में लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश अब भी जारी है।

आगे AAP गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने कहा कि इस समझौते की पहली ही पंक्ति में कहा गया है कि सभी औद्योगिक उत्पादों और कृषि उत्पादों पर टैरिफ में छूट और निवेश दिया जाएगा। यहीं से लोगों के मन में शंका पैदा होती है। दूसरा बड़ा सवाल तेल का है। अगर भारत को रूस से सस्ते दाम पर तेल मिल रहा है, तो फिर हम महंगे दाम पर अमेरिका से तेल खरीदने के लिए दबाव क्यों स्वीकार कर रहे हैं? जब सस्ता विकल्प मौजूद है, तो महंगा क्यों? यह सवाल सिर्फ तेल का नहीं है। यह सवाल देश की स्वायत्तता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता का है। क्या भारत अब खुद निर्णय लेने में सक्षम नहीं है? क्या भारत डर रहा है कि अगर आज अमेरिका की बात नहीं मानी, तो भविष्य में इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी? यह सवाल किसी एक नेता का नहीं है, यह सवाल पूरे देश का है। हमें इतिहास याद है। जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई थी, तब वह भी व्यापार करने ही आई थी। लेकिन धीरे-धीरे व्यापार शासन में बदल गया और देश गुलामी की ओर धकेल दिया गया। 1757 में कंपनी भारत आई। 1857 में पहली स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू हुई। लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई, घर उजड़ गए। माताओं की गोद सूनी हो गई। बहनें विधवा हो गईं। इन बलिदानों के बाद भी देश को 1947 तक स्वतंत्रता नहीं मिली। एक गलत समझ, एक गलत समझौता, देश को सदियों तक गुलामी में धकेल सकता है। इतिहास इसका गवाह है। आज केंद्र सरकार जिस तरह अमेरिका के साथ समझौता करने जा रही है, क्या वह एक नए प्रकार की गुलामी की शुरुआत तो नहीं है? किन दबावों में यह हो रहा है, यह अलग चर्चा का विषय है। लेकिन यह समझौता देश के भविष्य के लिए खतरनाक दिशा में पहला कदम हो सकता है। मैं हर देशभक्त नागरिक से बस इतना कहना चाहता हूं: ठंडे दिमाग से सोचिए। अगर आज हम गलती करेंगे, अगर आज हम समर्पण करके समझौता कर लेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। इतिहास में यह क्षण हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी गलती के रूप में दर्ज होगा और इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। मैं सरकार से, भारतीय जनता पार्टी से और हर देश से प्रेम करने वाले नागरिक से निवेदन करता हूं कि एक बार अपनी अंतरात्मा से पूछें—क्या हम अपने स्वार्थ के लिए पूरे देश को खतरे में डालने के लिए तैयार हैं?

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