गुजरात विधानसभा में गोपाल इटालिया ने उठाए गंभीर मुद्दे: जूनागढ़-भावनगर की खाली पंचायत सीटें और महंगी बिजली पर सवाल

गुजरात विधानसभा में गोपाल इटालिया ने उठाए गंभीर मुद्दे: जूनागढ़-भावनगर की खाली पंचायत सीटें और महंगी बिजली पर सवाल

AAP विधायक गोपाल इटालिया ने गुजरात विधानसभा में जूनागढ़ और भावनगर में लगभग 300 पंचायत सीटें खाली होने, निजी अस्पतालों को 1,712 करोड़ रुपये भुगतान और महंगी बिजली की खरीद पर सवाल उठाए, सरकार की विफलताओं को उजागर किया।

आम आदमी पार्टी के विसावदर के विधायक गोपाल इटालिया ने विधानसभा की प्रश्नोत्तर प्रक्रिया के संबंध में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि आज मैंने अपने विधानसभा क्षेत्र विसावदर–भेसाण–जूनागढ़ तथा पूरे गुजरात से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। प्रश्न क्रमांक 17 के तहत उन्होंने भावनगर और जूनागढ़ जिलों में तालुका तथा ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच एवं वार्ड सदस्यों की कितनी सीटें खाली हैं, इसकी जानकारी मांगी थी। सरकार द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार जूनागढ़ जिले में जूनागढ़ तालुका में एक, मालिया हाटीना में दो, वंथली में एक, जबकि भावनगर जिले के जेसर और सिहोर तालुका में एक-एक सरपंच का पद खाली है। इस प्रकार दोनों जिलों में मिलाकर चार सरपंच के पद वर्षों से रिक्त हैं। कई बार चुनाव और उपचुनाव घोषित किए जाने के बावजूद उम्मीदवार न मिलने से ये पद भरे नहीं जा सके हैं। जूनागढ़ तालुका में 21, मंगरोल में 5, विसावदर में 21 और भेसाण में 12 वार्ड सदस्यों के पद खाली हैं। कुल मिलाकर जूनागढ़ जिले में लगभग 85 ग्राम पंचायत सदस्यों के पद रिक्त हैं। भावनगर जिले में भी लगभग 212 वार्ड सदस्यों के पद रिक्त होने की बात सरकार ने स्वीकार की है। इस प्रकार केवल दो जिलों में ही सरपंच और सदस्यों को मिलाकर लगभग 300 पद वर्षों से खाली हैं। गोपाल इटालिया ने इस स्थिति के लिए भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि मतदाता सूची में अनियमितताओं और आरक्षण प्रणाली के गलत क्रियान्वयन के कारण कई गांवों में आरक्षित सीटों के लिए उपयुक्त श्रेणी के उम्मीदवार उपलब्ध ही नहीं हैं। कुछ स्थानों पर SC, ST या OBC के लिए सीट आरक्षित होती है, लेकिन उन गांवों में उस वर्ग की जनसंख्या न होने के कारण उम्मीदवार नहीं मिलते। परिणामस्वरूप बार-बार चुनाव घोषित होने के बावजूद नामांकन पत्र भरे नहीं जाते और सीटें खाली ही रह जाती हैं। सरपंच और सदस्य न होने के कारण ग्राम पंचायतों को मिलने वाली सरकारी अनुदान राशि का उचित उपयोग नहीं हो पाता और विकास कार्य रुक जाते हैं।

विधायक गोपाल इटालिया ने आगे कहा कि सरकार द्वारा आयुष्मान कार्ड सहित विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं की बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन उनकी वास्तविक स्थिति क्या है, यह जानने के लिए उन्होंने प्रश्न पूछा था। सरकार के जवाब के अनुसार केवल सूरत और राजकोट शहरों में पिछले दो वर्षों में लगभग 1,712 करोड़ रुपये निजी अस्पतालों को चुकाए गए हैं। गोपाल इटालिया ने दावा किया कि इतनी बड़ी राशि यदि सरकारी अस्पताल बनाने में खर्च की गई होती, तो लोगों के लिए स्थायी और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा खड़ी की जा सकती थी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली और पंजाब में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार ने निजी अस्पतालों के बजाय सरकारी अस्पतालों को मजबूत किया, स्टाफ की भर्ती की और मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि 1,712 करोड़ रुपये में कम से कम 100 करोड़ की लागत से अनेक आधुनिक सरकारी अस्पताल बनाए जा सकते थे, साथ ही तालुका स्तर पर स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों का विकास किया जा सकता था। उन्होंने दावा किया कि यदि अहमदाबाद, वडोदरा, भावनगर और जामनगर सहित अन्य शहरों के आंकड़े जोड़े जाएं, तो निजी अस्पतालों को चुकाई गई राशि दशकों में हजारों करोड़ तक पहुंच सकती है।

गोपाल इटालिया ने कहा कि मेरा दूसरा प्रश्न यह था कि अदाणी कंपनी और एस्सार कंपनी से सरकार बिजली खरीदती है। तो इस बिजली खरीद के एग्रीमेंट क्या हैं, बिजली के दाम में कितना वृद्धि हुई है और सरकार ने कितनी बिजली खरीदी है, इस संबंध में मैंने प्रश्न पूछा था। क्योंकि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार ने देश के इतिहास में पहली बार 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त देने की शुरुआत की। पंजाब में आम आदमी पार्टी की भगवंत मान की सरकार वर्तमान में भी 300 यूनिट बिजली मुफ्त देती है। जबकि गुजरात में लोगों से अधिक वसूली की जाती है और अभी भी बिजली दरों में वृद्धि होने वाली है। स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया चल रही है, जिसके कारण बड़े बिल आने की आशंका है। यह सारी बिजली के पैसे किसकी जेब में जाते हैं? इसका जवाब आज सरकार ने विधानसभा में दिया कि पिछले दो वर्षों में अदाणी कंपनी से लगभग 15,000 करोड़ रुपये की बिजली खरीदी गई है। सरकार के पास अपने बिजली उत्पादन संयंत्र हैं। विभिन्न थर्मल पावर प्लांट, सोलर पावर प्लांट और अन्य संस्थाएं भी हैं। फिर भी सरकार अपने उत्पादन केंद्रों की उपेक्षा कर निजी कंपनियों पर निर्भर होती जा रही है। सरकार पहले निजी कंपनियों को सब्सिडी देती है, उसके बाद उन्हीं कंपनियों द्वारा उत्पादित बिजली महंगे दाम पर खरीदती है और फिर वही बिजली जनता को अधिक दर पर बेचती है। परिणामस्वरूप कंपनियों और भाजपा के लोगों को लाभ होता है और आम जनता की कमर टूटती है।

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