Pregnancy से पहले कराएं ये जांच, पता चलेगा कि होने वाले शिशु को डाउन सिंड्रोम होने का खतरा है या नहीं।

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Pregnancy से पहले कराएं ये जांच, पता चलेगा कि होने वाले शिशु को डाउन सिंड्रोम होने का खतरा है या नहीं।

Pregnancy से पहले जरूर करवाएं ये जांच, ताकि समय रहते पता चल सके कि शिशु को डाउन सिंड्रोम है या नहीं

हजारों में से किसी एक नवजात में डाउन सिंड्रोम पाया जाता है, जो एक गंभीर आनुवंशिक स्थिति है। इससे पीड़ित बच्चों को जन्म के बाद कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि Pregnancy के दौरान कुछ विशेष जांचों के जरिए इस स्थिति का पहले ही पता लगाया जा सकता है।

डाउन सिंड्रोम की पहचान प्रेग्नेंसी में संभव

फिल्म ‘सितारे ज़मीन पर’, जो 20 जून को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई, इसी विषय को उजागर करती है। फिल्म में डाउन सिंड्रोम से जूझते बच्चों की जिंदगी को दिखाया गया है। यह स्थिति जन्म से पहले ही बच्चे में विकसित हो जाती है और इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है – केवल इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन Pregnancy की शुरुआत में कराई गई कुछ जरूरी जांचों से इसके खतरे का आकलन किया जा सकता है।

किन टेस्टों से मिलता है संकेत?

यदि समय रहते टेस्ट करवा लिए जाएं तो शिशु के स्वास्थ्य और किसी भी संभावित जेनेटिक डिसऑर्डर की जानकारी पहले ही मिल सकती है। इनमें प्रमुख रूप से कुछ स्क्रीनिंग और डायग्नॉस्टिक टेस्ट शामिल होते हैं, जैसे:

  • नक्ल ट्रांसलूसेंसी स्कैन (NT स्कैन)
  • डबल मार्कर टेस्ट
  • कैरियोटाइपिंग
  • नॉन-इनवेसिव प्रेनेटल टेस्टिंग (NIPT)
  • एम्नियोसेंटेसिस और कोरियोनिक विल्लस सैंपलिंग (CVS) (यदि ज़रूरत हो)

क्यों जरूरी है ये जांच?

Pregnancy महिला के जीवन का बेहद संवेदनशील और अहम समय होता है। इस दौरान मां और गर्भस्थ शिशु दोनों को कई प्रकार की जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। कुछ बच्चों में जन्मजात विकृतियां या विकार हो सकते हैं, जिनसे उनका संपूर्ण जीवन प्रभावित हो सकता है। डाउन सिंड्रोम ऐसी ही एक स्थिति है, जिससे भारत में हर 800 में से एक शिशु प्रभावित होता है — इंडियन पीडियाट्रिक सोसाइटी के अनुसार।

इसलिए, यदि आप माता-पिता बनने की योजना बना रहे हैं या गर्भावस्था की शुरुआती अवस्था में हैं, तो इन जरूरी टेस्ट्स की जानकारी डॉक्टर से जरूर लें और समय रहते जांच करवाएं। इससे न सिर्फ आपको शिशु के स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन होगा, बल्कि उचित निर्णय लेने में भी मदद मिलेगी।

क्या होता है डाउन सिंड्रोम? जानिए कारण, पहचान और बचाव के तरीके

गर्भ के दौरान कुछ शिशु डाउन सिंड्रोम से प्रभावित हो सकते हैं। यह एक आनुवांशिक विकार है, जिसमें शिशु के शरीर में क्रोमोजोम 21 की एक अतिरिक्त कॉपी मौजूद होती है। इसकी वजह से बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ता है।

डाउन सिंड्रोम के प्रकार:

डाउन सिंड्रोम मुख्यतः तीन प्रकार का होता है:

  1. ट्राइसॉमी 21 – सबसे आम रूप, जिसमें प्रत्येक कोशिका में क्रोमोजोम 21 की तीन प्रतियां होती हैं।
  2. ट्रांसलोकेशन – इसमें अतिरिक्त क्रोमोजोम 21 किसी अन्य क्रोमोजोम से जुड़ जाता है।
  3. मोजेकिज्म – कुछ कोशिकाओं में अतिरिक्त क्रोमोजोम 21 होता है, जबकि बाकी सामान्य होते हैं।

इस स्थिति से ग्रस्त बच्चों को जीवनभर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। उन्हें पढ़ने, बोलने और समझने में कठिनाई होती है, और उन्हें निरंतर मेडिकल देखभाल व थेरेपी की ज़रूरत होती है।

डाउन सिंड्रोम की पहचान कैसे हो?

इसका पता Pregnancy के दौरान ही लगाया जा सकता है। डॉ. वाणी पुरी रावत निम्नलिखित टेस्ट की सलाह देती हैं:

1. फर्स्ट ट्राइमेस्टर स्क्रीनिंग (11–13 सप्ताह):

  • NT स्कैन (न्यूकल ट्रांसलूसेंसी स्कैन): यह स्कैन भ्रूण की गर्दन के पीछे तरल की मोटाई को मापता है।
  • ब्लड टेस्ट: गर्भवती महिला के खून में विशेष प्रोटीन और हार्मोन के स्तर की जांच करता है।

2. सेकंड ट्राइमेस्टर स्क्रीनिंग (15–20 सप्ताह):

  • इस चरण में अतिरिक्त बायोमार्कर की जांच की जाती है जो संभावित आनुवंशिक विकारों की ओर इशारा कर सकते हैं।

3. कंबाइंड टेस्ट:

  • फर्स्ट और सेकंड ट्राइमेस्टर की जांचों का संयोजन जो अधिक सटीक परिणाम देता है।

4. cfDNA (सेल-फ्री डीएनए) टेस्ट:

  • Pregnancy के 10वें सप्ताह से किया जा सकता है। यह ब्लड टेस्ट प्लेसेंटा से आए डीएनए को जांचता है और क्रोमोजोम 21 की अतिरिक्त कॉपी की पुष्टि करता है।

क्या डाउन सिंड्रोम का इलाज संभव है?

डाउन सिंड्रोम का कोई स्थायी इलाज नहीं है। लेकिन विभिन्न प्रकार की थेरेपी (जैसे स्पीच, फिजियो और ऑक्यूपेशनल थेरेपी) और स्पेशल एजुकेशन की मदद से ऐसे बच्चों को बेहतर जीवन जीने में सहायता दी जा सकती है। समय पर निदान और सही देखभाल से उनका विकास बेहतर हो सकता है।

 

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