Gestational Diabetes During Pregnancy: गर्भावस्था में मां और बच्चे की सुरक्षा के लिए जानें जरूरी उपाय

by Neha
Gestational Diabetes During Pregnancy: गर्भावस्था में मां और बच्चे की सुरक्षा के लिए जानें जरूरी उपाय

Gestational Diabetes During Pregnancy: गर्भावस्था में शुगर कंट्रोल करना बेहद जरूरी है। जानें जेस्टेशनल डायबिटीज के लक्षण, असर और मां-बच्चे को सुरक्षित रखने के आसान उपाय।

Gestational Diabetes During Pregnancy: गर्भावस्था का समय खुशियों और उत्साह से भरा होता है, लेकिन इस दौरान कुछ स्वास्थ्य जोखिम भी छिपे होते हैं। इनमें से एक गंभीर समस्या है जेस्टेशनल डायबिटीज (Gestational Diabetes)। यह प्रेग्नेंसी के दौरान शुगर (Blood Sugar) बढ़ने से होती है और यदि समय पर पहचान और नियंत्रण न किया जाए, तो यह मां और बच्चे दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

जेस्टेशनल डायबिटीज (Gestational Diabetes) के लक्षण

अक्सर जेस्टेशनल डायबिटीज बिना स्पष्ट लक्षण के बढ़ती है। कई महिलाओं को तब तक पता नहीं चलता जब तक ब्लड शुगर टेस्ट में अधिक स्तर दिखाई न दे। यदि इसका इलाज न हो, तो डिलीवरी के समय जटिलताएं बढ़ सकती हैं और भविष्य में मां को टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी हो सकता है।

एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?

डब्ल्यूएचओ और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था के 24-28 हफ्तों के बीच ब्लड शुगर की जांच बेहद जरूरी है। भारत में DIPSI (Diabetes in Pregnancy Study Group of India) की गाइडलाइन के अनुसार यह जांच पहली एंटीनैटल विज़िट पर भी शुरू की जा सकती है। यह शुरुआती पहचान करने में मदद करती है और समय रहते खानपान, शारीरिक गतिविधियों और ब्लड शुगर मॉनिटरिंग जैसी सावधानियां अपनाने का अवसर देती है।

DIPSI 2023 की गाइडलाइन में बिना उपवास के 75 ग्राम ग्लूकोज टेस्ट को सरल और भरोसेमंद तरीका बताया गया है, जिसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी कराया जा सकता है।

also read: Typhoid Fever: दूषित पानी से फैल रहा जानलेवा टाइफाइड,…

बच्चे पर प्रभाव

अगर गर्भावस्था में ब्लड शुगर नियंत्रण में न रहे, तो बच्चे का वजन जरूरत से ज्यादा बढ़ सकता है, जिससे डिलीवरी में जटिलताएं बढ़ सकती हैं। कुछ नवजात बच्चों में जन्म के बाद शुगर अचानक कम हो सकती है और गंभीर मामलों में NICU में भर्ती की जरूरत पड़ सकती है।

कैसे करें बचाव और नियंत्रण?

  1. संतुलित आहार: कार्बोहाइड्रेट नियंत्रित करें, फाइबर युक्त भोजन शामिल करें और प्रोसेस्ड फूड व ज्यादा मीठे पदार्थ से बचें।

  2. हल्की-फुल्की एक्सरसाइज: रोज़ टहलना या प्रेग्नेंसी के लिए सुरक्षित योग ब्लड शुगर कंट्रोल में मदद करते हैं।

  3. दवाओं की निगरानी: यदि लाइफस्टाइल बदलाव पर्याप्त न हों, तो डॉक्टर की देखरेख में इंसुलिन या दवाएं दी जा सकती हैं।

डिलीवरी के बाद भी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। जेस्टेशनल डायबिटीज का अनुभव करने वाली महिलाओं में भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का खतरा अधिक रहता है। इसलिए डिलीवरी के 4-12 हफ्तों में और नियमित अंतराल पर ब्लड शुगर जांच जरूरी है।

You may also like

‘मेरी बेस्ट फ्रेंड ही मेरी पत्नी’ – विजय का इमोशनल पोस्ट वायरल तान्या मित्तल का गोल्ड iPhone और ‘राम’ कैप्शन… भक्ति या कोई बड़ा संकेत? 5 साल के रिश्ते पर लगी मुहर! करण ने दिल के पास बनवाया तेजस्वी का टैटू ‘वो मेरे भाई जैसा है’ — रजत संग नाम जुड़ने पर भड़कीं चाहत पांडे एल्विश यादव के ‘जस्टिन बीबर’ गाने पर बवाल, रैपर रागा ने लगाया लिरिक्स चोरी का आरोप